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उमर खालिद की गिरफ्तारी को ऐसे भी देखें

जे सुशील

उमर खालिद की गिरफ्तारी को देखने के कई एंगल हो सकते हैं. ये देखने वाले पर निर्भर करता है कि वो इस पूरे मामले को कैसे देखता है. लेकिन पहले थोड़ा व्यापक संदर्भ समझ लेते हैं.
पूरी दुनिया समेत भारत में वामपंथ का एक अजीब सा हौव्वा खड़ा किया जा रहा है और ये सिलसिला कब से शुरू हुआ है ये किसी से छुपा नहीं है. जो लोग शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और रूस की कहानी जानते समझते हैं वो इसे बेहतर समझेंगे. अमेरिकी राजनीति में कम्युनिस्ट शब्द को गाली की तरह ही लिया जाता था और कई किस्से हैं जिसमें पढ़े लिखे लोगों तक को कम्युनिस्ट ब्रांड कर उनका करियर खत्म कर दिया है. लिखते लिखते जेहन में ट्रांबो का नाम याद आ गया. ट्रांबो फिल्म भी है जो सच्ची घटना पर आधारित है. जिसमें दिखाया गया है कि कैसे हॉलीवुड के एक सफल लेखक को कम्युनिस्ट बताकर उन्हें प्रताड़ित किया गया.

अगर कोई डोनल्ड ट्रंप के हालिया भाषण सुन ले तो उन्हें लगेगा कि अमेरिका से अगर किसी को खतरा है तो सिर्फ चीन से या फिर वामपंथियों से. शीत युद्ध खत्म होने और रूस के विघटन के बाद पूरी दुनिया में रूस समर्थक सरकारों के रवैये में बदलाव आया और सत्ता में बने वामपंथी धीरे धीरे सत्ता से दरकिनार हो गए या कर दिए गए अपने देशों में.

इसके बाद के उदारीकरण के दौर में फिर से एक बार जब पढ़े लिखे लोगों ने ये सवाल उठाया कि ग्लोबलाइजेशन के कुपरिणाम आ रहे हैं तो ऐसे लोगों को उस दौरान तो कुछ कहा नहीं गया क्योंकि ये एक नया आइडिया था. ग्लोबलाइजेशन की आलोचना करने वाली किताब के लेखक और इकोनोमिस्ट जोसेफ स्टीगलिट्ज को नोबेल पुरस्कार भी मिला. लेकिन इसके बाद लगातार अलग अलग ढंग से पूंजीवादी ताकतों या कहिए कारपोरेट ने एक्टिविस्टों के खिलाफ माहौल तैयार किया. दुनिया में हर जगह एक लड़ाई शुरू हुई बिग कारपोरेट बनाम गरीबों के हितैषी, पर्यावरण को बचाने की कवायद में लगे लोगों के बीच.

धीरे धीरे ऐसे सभी लोगों को वामपंथी, लेफ्टिस्ट, देश विरोधी नामों से पुकारा जाने लगा और पिछले बीस सालों में ये स्थापित हो गया कि गरीबों के हित की बात करने वाले लोगों को निशाने पर रखा जाएगा. भारत में इस कड़ी में अरूंधति राय से लेकर मेधा पाटकर तक के नाम हैं और आगे चाहें तो इसमें आप और सबके नाम भी जोड़ लें.

मिडिल क्लास ने एक दिन में इनका विरोध नहीं किया. पहले मिडिल क्लास भी समझता था कि ये लोग बात सही कह रहे हैं लेकिन ग्लोबलाइजेशन के फायदे मिडिल क्लास तक पहुंचे नहीं थे. नौकरियां सीमित थीं लेकिन नब्बे के दशक में नौकरियों की बाढ़ आई. जवान लोगों को नौकरियां मिलीं और उन्होंने जीवन में कम संघर्ष किया और किया भी तो उसे भूल गए. आरामतलबी बढ़ी और इसी के साथ कारपोरेट ने राजनीति को प्रभावित करना शुरू किया डायरेक्टली.

चूंकि एक हौव्वा खड़ा किया जाना था और कारपोरेट नहीं चाहता था कि उनके काम में कोई बाधा बने तो भारतीय जनता पार्टी ने वो कमान संभाली जिसे कहा गया कि हमारा दुश्मन हिंदू नहीं बल्कि वामपंथी लोग हैं. इसे एक बड़ा दायरा समझिए. वामपंथी, सेकुलरिस्ट, बौद्धिक आदि आदि. ये एक बड़ी छतरी जैसा दायरा बना दिया गया जिसमें हर वो लपेट लिया गया जो दिमाग की बात करता था.
साथ में मुसलमान भी आ गए. जो भारतीय मुसलमान ग्यारह सितंबर के बाद भी भड़के नहीं वो पिछले दस सालों में गाय के नाम पर मारे जाने लगे.

अब आते हैं भारत और उमर खालिद पर. आज से चार साल पहले कन्हैया कांड में भी उमर खालिद गिरफ्तार हुए थे. आज तक कन्हैया के ऊपर या उमर खालिद पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है. वो मामला सरकार को जमा नहीं क्योंकि कोर्ट में बानगी है पुरानी कि भारत सरकार के खिलाफ नारे लगाना देशद्रोह नहीं है.

इसके बाद पिछले समय का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ सीएए जिसके बारे में बताने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन इसके थोड़ा पीछे जाएंगे तो आपको भीमा कोरेगांव का मसला याद होगा. जहां बड़ी संख्या में दलित आए थे सरकार विरोधी प्रदर्शन करने. उस घटना को भी तूल दिया गया और गिरफतारी हुई हर उस पढ़े लिखे बौद्धिक की जो आदिवासियों या दलितों के लिए काम कर रहा था. नया टर्म था अर्बन नक्सल. आनंद तेलतुम्बड़े, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा इसी क्रम में गिरफ्तार हुए.

ये वो लोग थे जो जमीन पर काम कर रहे थे. बच गए दिल्ली के बौद्धिक जिन्हें अब सरकार ने सीएए के नाम पर लपेटा है. अपूर्वानंद, सीताराम येचुरी, उमर खालिद आदि आदि.
कल्पना कीजिए कि ये सभी लोग जेल में हों तो सरकार के खिलाफ कौन बोलेगा. रवीश कुमार, सिद्धार्थ वरदराजन और एकाध नाम और जोड़ लीजिए. क्या सरकार को इस कदम से फायदा है इस समय.

बिल्कुल फायदा है. सोचकर देखिए. सरकार जूझ रही है बेरोजगारी के मामले में, इकोनॉमी के मामले में. यूपी में ऐसा कानून आया है जिसमें बिना न्यायाधीश के गिरफ्तारी हो सकती है. सुशांत रिया से टीवी थक चुका है. रिया की गिरफ्तारी के बाद मसाला है नहीं.
अब उसके बाद ये मिल जाएगा उमर खालिद का मसला. कुछ नहीं तो महीना डेढ़ महीना निकल जाएगा इसी में. सरकार से सवाल कोई नहीं पूछेगा. महीना भर बाद कुछ और हो जाएगा. यही हो रहा है पिछले कुछ सालों में.

अब आते हैं. उमर खालिद का दोष है या नहीं. क्या वो गलत हैं या नहीं. ये सब वायवीय बात है. वो दोषी हैं या नहीं ये फैसला कोर्ट को तय करना है. मैं समझता हूं कि कोर्ट पर अभी भी भरोसा किया जाना चाहिए.

कोर्ट ने नरेंद्र मोदी को भी दोषी नहीं ठहराया था और मैं मानता हूं कि कन्हैया के मामले में भी कोर्ट ने कन्हैया को दोषी नहीं ठहराया है. हालांकि कोर्ट के कई फैसले निहायत ही गैर जिम्मेदाराना रहे हैं पिछले कुछ सालों में जिस पर प्रशांत भूषण कई बार ऊंगली उठा चुके हैं.

हो ये रहा है कि छह साल में जब से मोदी सरकार बनी है तब से विपक्ष नाम की चीज़ गायब है देश से. ऐसे में लेफ्ट लिबरल कहे जाने वाले सरकार विरोधी लोग हर उस आदमी में हीरो खोज ले रहे हैं जो मोदी के खिलाफ आवाज़ उठा रहा है. जबकि ऐसे छोटे मोटे हीरो खोजने की बजाय जमीन पर लोगों को जागरूक करने का काम किया जाना चाहिए था.

सरकार को पता है कि इस काम में किसी को रूचि नहीं है क्योंकि ये मेहनत का काम है. सरकार निरंकुश है. दिल्ली दंगों में सबने देखा है कि दिल्ली पुलिस की भूमिका क्या थी. गोली चला कर भाग गए नौजवान हिंदू हों तो गिरफ्तार नहीं किए जाते हैं. मुसलमान हो तो गिरफतारी हो जाती है. जेएनयू कैंपस में हिंसा का नंगा नाच करने वाले लोग आज तक गिरफ्तार नहीं होते हैं.

इस पर कोई आंदोलन हमारे सभ्य समाज ने आज तक नहीं किया है. ऐसे में वही होगा जो हो रहा है.
लेख लंबा हो गया है और बहुत सारे मुद्दे हैं. कई बातों से आप सहमत नहीं भी हो सकते हैं लेकिन बहस करने की बजाय ये सोचिए कि जो गरीब के हित की बात करता है सरकार उसके खिलाफ क्यों हो जाती है. क्या गरीब इस देश का नागरिक नहीं है.

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