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सरकार ने जारी किए बेरोजगारी के आंकड़े, भारत बना बेरोजगारों का देश

कल जो बेरोजगारी के आँकड़े सरकार ने जारी किए हैं, उसको देखते हुए हमें यह मान लेना चाहिए कि भारत दुनिया में सर्वाधिक बेरोजगारों वाला देश बन चुका है.

लेकिन समस्या यह है कि हमारी नींद खुल नही रही है. वो कहते हैं न कि सोते हुए को जगाया जा सकता है, लेकिन जो सोने का नाटक कर रहा हो उसे आप कैसे जगाओगे?.

शुरू से कह रहे थे कि नोटबन्दी के उद्योग धन्धो की कमर तोड़ दी है लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं था. अब यह रिपोर्ट उन्हीं बातों की पुष्टि कर रही है.

ध्यान दीजिए यह रिपोर्ट जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच जुटाए गए डेटा पर आधारित है. यानी यह नोटबंदी के बाद का पहला आधिकारिक सर्वेक्षण है. इससे पता चलता है कि उद्योग धंधों में कामगारों की जरूरत कम होने से ज्यादा लोग काम से हटाए गए. सेंटर फॉर इंडियन इकॉनोमी ने भी उस वक्त कहा था कि 2017 के शुरुआती चार महीनों में 15 लाख नौकरियां खत्म हो गईं.

यह एनएसएसओ की रिपोर्ट दिसंबर 2018 में जारी की जानी थी. लेकिन रिपोर्ट को दबा दिया गया. सरकार पर यही आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष सहित दो सदस्यों ने जनवरी में इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि रिपोर्ट को आयोग की मंजूरी मिलने के बाद भी सरकार जारी नहीं कर रही.

झूठे लोग अपने झूठ दावे करते रहे और बिका हुआ मीडिया उनकी हां में हां मिलाता गया. और सच बोलने वालों को झूठा साबित करने में लग गया. नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने उस वक्त कहा था कि “हम 70 से 78 लाख नौकरियों के अवसर पैदा कर रहे हैं, जो देश के कार्यबल में शामिल होने वाले नए लोगों के लिए पर्याप्त है. अरुण जेटली अपना अलग राग अलापते रहे कि पिछले तीन सालो में आंदोलन तो हुआ ही नहीं इसलिए हम जो कह रहे हैं उसे ही सच मान लो.

एनएसएसओ रिपोर्ट में कहा गया था कि 2017-18 में बेरोजगारी दर ग्रामीण क्षेत्रों में 5.3% और शहरी क्षेत्र में सबसे ज्यादा 7.8% रही। पुरुषों की बेरोजगारी दर 6.2% जबकि महिलाओं की 5.7% रही। इनमें नौजवान बेरोजगार सबसे ज्यादा थे, जिनकी संख्या 13% से 27% थी. लेकिन उन्हें सस्ता डाटा, हिंदुत्व और अन्धे राष्ट्रवाद की चरस की सप्लाई बदस्तूर जारी थी तो नोकरियों की किसे परवाह थी.

लेकिन आप यह स्थिति बहुत देर तक बनाए नहीं रख सकते. कभी न कभी तो डोज का असर खत्म हो जाता है और हकीकत की दुनिया मे लौटना पड़ता है. हम जानते हैं कि हम अंधों के शहर में आईने बेच रहे हैं. लेकिन किसी न किसी को यह काम करना ही होगा. बहुसंख्यक वर्ग के लिए यह ‘मियाकल्प’ का समय है, यह गलती मानने का समय है.

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