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रिपोर्ट

महाराष्ट्र पुराण: एक नंगे का दूसरे नंगे से पाला पड़ा है

बिहार में नीतीश और लालू ने मिलकर बीजेपी को धूल चटा दी थी। बाद में बीजेपी और जदयू ने लालू के साथ वही किया था जो बीजेपी के साथ आज महाराष्ट्र में हुआ है। अचानक सरकार गिराकर लालू को सत्ता से बाहर किया गया था।

इसलिए बीजेपी का यह आरोप तो सही है कि शिवसेना ने गठबंधन तोड़कर वादाखिलाफी की, लेकिन इसके अलावा सारे आरोप अनर्गल हैं।

जैसे बीजेपी महबूबा मुफ्ती तक के साथ सरकार बनाने का अधिकार रखती है, वैसे ही कोई भी दल किसी के भी साथ सरकार बना सकता है। दलों की नैतिकता और विचारधारा की यह बहस और सवाल जनता का है। पार्टियां खुद उस दलदल में हैं।

अगर अजित पवार के साथ सरकार चल जाती तो बीजेपी ने एक ऐसे आरोपी को डिप्टी सीएम बना दिया था जिस पर घोटाले के गंभीर आरोप हैं। खुद बीजेपी पर टेरर फंडिंग की आरोपी कंपनी से पैसा लेने का मामला अभी अभी सामने आया है। इलेक्टोरल बॉन्ड घोटाला भी अभी सामने आया है जिसके बारे में दस्तावेज सार्वजनिक हुए हैं।

जिस तरह बीजेपी समझती है कि उसे हर राज्य में, बहुमत न होने के बावजूद सरकार बनाने का अधिकार है, वैसे ही हर दल सरकार बनाने का अधिकार रखता है।

यह भी स्पष्ट है कि कोई भी दल जनता के लिए सरकार नहीं बनाता। सब अपने लिए सरकार बनाते हैं और जितना संभव है लूटते हैं। मौजूदा महाराष्ट्र का नाटक इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

जो यह समझते हैं कि मोदी जी ईमानदार हैं तो इसका भी ताज़ा प्रमाण महाराष्ट्र है जब अचानक रात में एक असंवैधानिक शपथग्रहण करवाया गया। 80 घंटे भी सरकार नहीं चल पाई। अगर सुप्रीम कोर्ट न होता तो जाने क्या क्या देखने को मिलता।

एक असंवैधानिक शपथग्रहण करवाकर बधाई देने वाले प्रधानमंत्री भी क्या जिम्मेदारी लेंगे? लोकतंत्र तो सामूहिक जिम्मेदारी का तंत्र है. सबसे अहम भूमिका पीएम की ही रही, जिन्होंने आधी रात को, बिना कैबिनेट मीटिंग आपात तरीके से राष्ट्रपति शासन हटवा दिया, जनता को नहीं बताया गया और लोग सोकर उठे तो प्रधानमंत्री बधाई दे रहे थे. राष्ट्रपति, गृहमंत्री, राज्यपाल की भी भूमिकाएं संदिग्ध रहीं. क्या ये सभी अपनी जिम्मेदारियां लेते हुए देश से माफी मांगेंगे? क्या इन्हें लोकतंत्र का तमाशा बनाने का अधिकार है? क्या ये लोग ​बताएंगे कि लोकतंत्र का तमाशा क्यों बनाया गया?

सरकार बनाने और समर्थन जुटाने की कोशिश करना किसी भी पार्टी का अधिकार है. जितना भाजपा का, उतना ही शिवसेना का या किसी अन्य पा​र्टी का. लेकिन अपनी कुर्सी और सत्ता की हवस के लिए विधायक खरीदने को राष्ट्र का खजाना खोल देना क्या देश को लूटना नहीं है?

अब बीजेपी के पास अंतिम विकल्प कर्नाटक वाला है. ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ का कुत्सित इस्तेमाल करते हुए आराम से विधायक खरीदे जाएं और बनी सरकार गिराकर अपनी सरकार बनाई जाए.

लेकिन याद रहे कि एनसीपी के गायब विधायकों को शिवसैनिक गुड़गांव से पकड़ ले गए. एक को एयरपोर्ट से ले आए. एक रात को होटल से जा रहा था तो उसे भी धर लिया.

बीजेपी अगर अब यहां विधायक खरीद भी ले तो शिवसैनिक घर से उठा ले जाएंगे. एक नंगे का दूसरे नंगे से पाला पड़ा है.

इसका सीधा अर्थ है कि महाराष्ट्र कर्नाटक नहीं है, न ही शिवसेना जेडीएस है. यहां बनी हुई सरकार गिराना बीजेपी को और भारी पड़ेगा.

अब लोग सवाल करेंगे कि कांग्रेस और एनसीपी ही कौन ईमानदार हैं, तो यह भी सही है। बनी सरकार गिराकर कुर्सी कब्जाने का खेल कांग्रेस का ही है जिसपर बीजेपी ज्यादा बेशर्मी से अमल कर रही है। इस अलोकतांत्रिक पाप की सबसे बड़ी गठरी कांग्रेस के सिर पर रखी है।

देश भर में अगर बीजेपी सिमट रही है तो इसका महत्व सिर्फ इतना है कि बीजेपी की निरंकुशता पर लगाम लगेगी। जो लोग मोदी की छवि को लेकर पागल हुए जा रहे थे वे भी यह समझ जाएंगे कि मोदी भी काजल की कोठरी में रहते हैं और उनका दामन भी उतना ही काला है।

सत्ता में कोई रहे, हम तो विपक्ष में ही रहेंगे क्योंकि हम जनता की तरफ हैं और जनता की बनाई हुई सत्ता का चरित्र हमेशा जनविरोधी होता है।

यह हमें अच्छी तरह याद है कि तीन लाख किसानों की आत्महत्या की गिनती कांग्रेस ने ही गिनी थी। महाराष्ट्र किसानों की कब्रगाह है। यह उसकी महान नीतियों का नतीजा है। मोदी जी कांग्रेस से भी आगे निकल गए और आत्महत्या का आंकड़ा ही दबा लिया।

अब देखना है कि इस नई सरकार के पास इस कब्रगाह का क्या इलाज है?

जय हिंद!

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