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एकता थोपी हुई नहीं होती और अगर थोपी जाती है तो वह एकता नहीं होती

हेमंत कुमार झा

जो लोग “एक विधान, एक निशान” की बातें करते हुए उत्साह और उन्माद से भर कर इसे राष्ट्रीय एकता से जोड़ते हैं वे अर्द्धसत्य ही नहीं, भ्रामक सत्य का प्रचार कर रहे हैं। एकता थोपी हुई नहीं होती और अगर थोपी जाती है तो वह एकता नहीं होती।

थोपी गई एकता भ्रम का एक आवरण रचती है जिसकी सतह के नीचे पनपता जाता है असंतोष, जो अंततः आक्रोश का रूप लेता है। ऐसी ऊपरी एकता का छद्म आवरण निर्मित करने वाली प्रवृत्ति एक तरफ अंतर्विरोधों को छिपा कर सत्ता-संरचना के भीतर मौजूद वर्चस्वमूलक शक्तियों और उनके षड्यंत्रों पर पर्दा डालने का काम करती है। इस आलोक में अगर हम कश्मीर के मामलों को देखें तो अधिक आश्वस्ति का अहसास नहीं होता। भविष्य को लेकर एक संशय, एक डर बन जाता है कि पता नहीं, आगे क्या हो।

वैसे, धारा 370 को निष्प्रभावी बना कर पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार ने अपने होने को सार्थक किया है। उनका तो यह एक प्रमुख एजेंडा था ही। चुनाव दर चुनाव वे अपने घोषणापत्रों में इसे दुहराते रहे हैं। देश भर में फैले भाजपा के करोड़ों कार्यकर्त्ताओं और धुर समर्थकों की आंखों में दशकों से यह सपना तैरता रहा है कि उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार बने और राम मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता के साथ ही कश्मीर से धारा 370 का खात्मा हो। आज मोदी-शाह की जोड़ी ने इनमें से एक को अंजाम तक पहुंचाया तो उनके साहस की दाद देनी चाहिये। उनके कार्यकर्त्ताओं के मन में उत्साह का संचार तो हुआ ही है, अपने लोकप्रिय नेता के प्रति उनकी आस्था भी निश्चित रूप से बढ़ी होगी।

लेकिन, देश के संवेदनशील मुद्दों के सम्यक निपटान और कार्यकर्त्ताओं की संतुष्टि में फर्क है। देश कार्यकर्ताओं और समर्थकों से अधिक महत्वपूर्ण है और कोई राजनेता इतिहास में इस आधार पर परखा जाता है कि उसके फैसलों ने देश की दूरगामी दशा-दिशा पर कैसा प्रभाव डाला।

बहुसंख्यक वर्चस्ववाद और इससे उपजे उन्माद की संतुष्टि के लिये उठाए गए कदमों को इतिहास किस नजरिये से देखता है यह उसके अनेक अध्यायों को पलट कर देखा जा सकता है। कश्मीर का मुद्दा इस देश के लिये ऐसा नासूर बन गया था जो अब असह्य पीड़ा देने लगा था। न जाने कितनी शहादतें, न जाने कितने संसाधनों की बर्बादी। कोई राह नजर नहीं आ रही थी।

ऐसे में, अगर नरेंद्र मोदी ने गतिरोध को तोड़ा है तो उन्हें इस मुद्दे को हैंडल करने का अवसर मिलना चाहिये। यह अवसर उनके पास है भी क्योंकि 5 वर्षों की उनकी दूसरी पारी अभी शुरू ही हुई है।

यद्यपि, इस अंजाम तक पहुंचने के लिये जिस तरीके को उन्होंने अपनाया उसे अनेक संविधान विशेषज्ञ संविधान सम्मत नहीं बता रहे। केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल की सहमति कश्मीर के जन प्रतिनिधियों की सहमति नहीं है। राज्यपाल कश्मीरी जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

बीते दस-पंद्रह दिनों में कश्मीर में जो हालात बनाए गए और इस कारण देश में जो सनसनी फैली, उसने कश्मीर मुद्दे को लेकर सरकार के तौर-तरीकों को संदेह से भर दिया है। आप कह सकते हैं कि और कोई तरीका बचा ही नहीं था। लेकिन, आप यह भी कह सकते हैं कि यह मोदी-शाह मार्का समाधान है। हालांकि, इस मार्का समाधान के अपने खतरे हैं, अपने अंतर्विरोध हैं।

समझ में नहीं आता कि वे कश्मीर समस्या को सुलझाना चाह रहे हैं या देश की बहुसंख्यक आबादी को सनसनी में डाल कर, उन्माद से भर कर उनमें ऐसी नकारात्मकता का संचार करना चाहते हैं जो अल्पसंख्यक विरोध के नाम पर उनके पीछे एकजुट रहे और देश की खस्ताहाल होती अर्थव्यवस्था से ध्यान हटा कर भीड़ की शक्ल में बहुसंख्यकवाद की पाशविक ताकत के अहसास से भर कर उन्मादी नारे लगाती रहे।

गांधी ने उद्देश्य तक पहुंचने के लिये साधनों की पवित्रता पर जो जोर दिया था उसकी प्रासंगिकता इस मामले में अहम है।

क्या नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने इस फैसले के लिये जिन तरीकों को अपनाया वे राजनीतिक और नैतिक रूप से उचित हैं? आप किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में बसी एक-सवा करोड़ की आबादी को मनमर्जी से, सत्ता और शक्ति के सहारे अनंत समय तक हांक नहीं सकते। दमन हमेशा प्रतिकार को जन्म देता है, भले ही प्रतिकार के उभरने में वक्त लगे।

गौर कीजिये उन तत्वों पर, जो देश के, खास कर उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में सड़कों पर, चौराहों पर अबीर-गुलाल ऐसे उड़ा रहे हैं, जैसे किसी जीत के जश्न में डूबे हों। कौन हैं वे लोग?

ये वही लोग हैं जिनकी नौकरियां छीनी जा रही हैं, जिनके रोजगार के अवसर संकुचित होते जा रहे हैं, श्रम कानूनों में बदलाव लाकर जिन्हें कारपोरेट का गुलाम बनाया जा रहा है, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल के माध्यम से जिनके बच्चों की जिंदगियों को झोला छाप डॉक्टरों के भरोसे किया जा रहा है, जिनके बच्चों को शिक्षा के अवसरों से वंचित करने की सारी तैयारियां नई शिक्षा नीति में कर ली गई है।

जिनकी अपनी जिंदगियां खुद के लिये, उनके परिवार और समाज के लिये सवाल बन कर खड़ी हैं, समस्या बन कर खड़ी हैं वे कश्मीर समस्या के लिये सड़कों पर भीड़ की शक्ल में मजमा लगाए खड़े हैं, एक दूसरे पर गुलाल उड़ा रहे हैं, उकसाने वाले नारे लगा रहे हैं। उन्हें नहीं पता कि माहौल में उड़ता गुलाल उनकी दृष्टि को इस तरह से धुंधली कर रहा है कि वे न सत्य को पहचान पा रहे, न उन खंदकों को पहचान पा रहे जिनमे वे बाल-बच्चों समेत गिरते जा रहे हैं। बहरहाल, समाधान की दिशा में बढ़ा सरकार का यह निर्णायक कदम अधिक आश्वस्त नहीं कर रहा। एक भय का संचार भी मन में हो रहा है। ताकत के दम पर अस्मितावादी विवादों का हल निकल जाए, यह कैसे संभव होगा? आप पाकिस्तान को रगड़ सकते हैं, आतंकियों को रौंद सकते हैं लेकिन अपने ही भाई-बंधुओं को न आप रगड़ सकते हैं, न रौंद सकते हैं। अगर कश्मीर देश का है तो कश्मीरी भी देश के हैं और देश उनका है। भावनाओं में दूरी बाकी रह गई तो ताकत का प्रयोग कर स्थापित की गई एकता अपने भीतर इतने अंतर्विरोधों को जन्म देगी कि कभी भी ऐसी ऊपरी एकता का शीराज़ा बिखर सकता है। यह बहुत भयानक मंजर हो सकता है।

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