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घूंघट और बुर्के में बंधी औरतों के सात विद्रोह

शायक आलोक

कोशा नाम की एक नदी थी कोई जो ठहर गई थी और उसके पश्चिम में कोशारी नाम का गाँव था जो बहने लगा था.. इसी बहते हुए गाँव की ओशिया नामक स्त्री को एक दिन विद्रोह का स्वप्न आया .. तो जब नींद से जगी वह तो विद्रोह जताने पहले तो खींचकर अपना दुपट्टा अपनी छाती से अलग कर दिया और फिर उस दुपट्टे को अपनी झोपड़ी के ऊपर झंडे की तरह लहरा दिया..

2013, शायकिस्तान.


युवा लड़कों ने एक-दूसरे की कलाई थामी और एक घेरा बना लिया. घेरे के अंदर स्त्रियां थीं. कुछ बुर्कानशीं थीं, कुछ ने बुर्का उतार फेंका था. बुर्का उतार फेंकने वाली स्त्रियां बुर्के के अंदर और बाहर की दुनिया का फर्क़ ढूंढ रही थीं. एक पत्रकार एक बुर्कानशीं औरत से पूछा पड़ा – और तुम क्या तलाश रही स्त्री ? औरत ने जवाब दिया – सवाल हमारे चयन का है, हम बुर्का पहने या उतार फेंके, चयन हमारा. यह चयन सत्ता थोप नहीं सकती.

1979, ईरान


उसी एक रोज़
उसके दुपट्टे के कोर में बंधा था बिरयानी का मसाला
उसके सुफेद सलवार पर गिर आया
डर गयी हीर सुफियां
फिर बिस्तर पर पड़े बुरके को देखा और हँस पड़ी

बुरके के अन्दर और बुरके के बाहर है दो अलग दुनिया
जानती है हीर सुफियां.

2012, शायकिस्तान


इक़बाल बानो ने काले रंग की साड़ी पहनी और लाहौर स्टेडियम में हजारों की भीड़ के सामने कविता गा उठी – लाज़िम है कि हम भी देखेंगे. साड़ी को इस्लाम-विरोधी पहनावा कहने वाले उल हक़ के पाकिस्तान में एक मुस्लिम औरत ने साड़ी को परचम बना दिया.


लड़की ने माथे का अनिवार्य दुपट्टा माथे से उतारा और अभिव्यक्ति की किसी अनिवार्यता की तरह एक लकड़ी में बांध आकाश में लहरा दिया.

2018, ईरानिस्तान


मैं बेतहाशा हताश होता हूँ तो हँसने लगता हूँ. पता नहीं किस पर हँसता हूँ, खुद पर या दुनिया पर.

2016, नई दिल्ली


इन्हीं दिनों ईरान की एक स्त्री ज़ोर से हँसी. हँसते हुए कहा कि ये पश्चिम की स्त्रियां पश्चिम में हमें बुर्का दिलाने के लिए हलकान हैं, हमें यहां झांकने भी नहीं आ रहीं.

2019, न्यू यॉर्क

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