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शर्मनाक: यूपी के शामली में पुलिस ने पत्रकार को पीटा और मुंह पर पेशाब किया

असगर

शामली शहर में धीमानपुरा फाटक बंद था। घुप अंधेरा था। स्टेशन की तरफ से मालगाड़ी आई। ट्रैक बदलते ही जैसे आगे बढ़ी तेज धमाका हुआ और मालगाड़ी के दो पहिए ट्रैक से नीचे उतर गए। इस हादसे के वक़्त मौजूद लोगों ने बताया कि बहुत तेज कुछ घिसटने की आवाज आई। वे डर गए। समझ नहीं सके कि आखिर क्या हुआ है। कुछ देर बाद घटना का पता चला।

इस हादसे की रिपोर्टिंग करने के लिए न्यूज़ 24 के पत्रकार अमित शर्मा गए थे। जीआरपी पुलिस मौके पर पहुंच गई थी। सादे कपड़ों में पुलिस वाले बताए जा रहे हैं। अमित शर्मा रिपोर्ट तैयार करने लगे। लेकिन जीआरपी वाले गुंडागर्दी पर उतर आए। खुद देखिए किस तरह बेरहमी से पीट रहे हैं। बाकी अगर अमित शर्मा की बात सुनें तो उनके साथ शर्मनाक हरकत की गई। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उनका इल्ज़ाम है कि कैमरा छीन लिया गया। मुंह में पेशाब किया। थप्पड़, घूंसे मारते हुए वीडियो में खुद देख सकते हैं। कपड़े गीले वीडियो में भी नजर आ रहे हैं। ये सब यूपी में हुआ है। जहां हमारी मीडिया ये सवाल कर रही थी कि कौन यूपी का माहौल बिगाड़ रहा है। कौन साजिश रच रहा है। वो सीएम से सवाल नहीं कर रही है, जबकि पश्चिम बंगाल में सीएम से सवाल नहीं कर रही, बल्कि अपनी रिपोर्ट में सीएम को हर हादसे के लिए मुजरिम ठहरा रही है।

यूपी में हो रहे जुर्म को लेकर गुंडाराज की बात नहीं की जा रही है। कभी रेप की खबरें, कभी अलीगढ़ जैसी खौफनाक वारदात।

अगर आप चापलूसी वाली पत्रकारिता करते रहेंगे तो मुंह में पेशाब कर देना कोई बड़ी वारदात नहीं मानी जाएगी। इससे भी ज़्यादा खौफनाक हरकतों के लिए तैयार रहिए। अभी आप प्रशांत कन्नौजिया की पत्रकारिता में वैल्यू तलाश रहे थे। चलिए अब अमित शर्मा के लिए अभियान चलाते हैं…।

पुलिस ये बर्ताव कर रही है तो बाकी तो क्या ही उम्मीद की जाए। पत्रकार बोलेंगे तो मारे जाएंगे। पीटे जाएंगे। मूत पिलाया जाएगा। पत्रकार किसकी आवाज़ उठाए, जब उसकी आवाज़ को अनसुना कर दिया जाएगा। पत्रकार की भी फैमिली होती है। उसके भी ज़िंदगी के सपने होते हैं। मगर 25-30 हज़ार रुपए कमाने वाला पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर परिवार के लिए सपने सजा रहा है। पुलिस जो हिफाज़त के लिए थी, वही कभी दिल्ली से उठा लेती है। कभी फर्जी मुकदमों में फंसा लेती है। मैं लिखता हूं तो पहले सोच लेता हूं कि कल पुलिस मुझे उठाएगी। मेरे साथ तो वो दाढ़ी भी दिखाएगी। दो चार हथियार बरामद करके दिखा देगी। फिर क्या मजाल जो कोई मेरे साथ आवाज़ भी उठा सके। सबको अपना दामन बचाना भारी पड़ जाएगा।

डेस्क पर काम करता हूं। क्राइम की खबरें एडिट करता हूं। उनमें देखता हूं कि जितने भी लुटेरों, चोरों को पुलिस पकड़ती है सबकी थियोरी एक ही होती है। “पुलिस को देखकर भागने लगे, पुलिस ने पीछा किया। आरोपियों ने फायरिंग की। पुलिस ने जवाबी फायरिंग कर दबोच लिया। आरोपी के पास से देसी कट्टा बरामद हुआ है। आरोपी बड़ी साजिश या लूट की फिराक में था।”

ये है पुलिस की कार्यशैली। वारदात हो जाए तो तब तक खाली हाथ रहती है, जब तक कहीं से अधिकारियों पर प्रेशर ना पड़े। आम लोगों की तो शिकायत भी दर्ज नहीं होती। दर्ज हो भी कैसे। आम लोगों के अंदर पुलिस का इतना खौफ होता है कि क्या मजाल वो पुलिस स्टेशन में भी एंट्री कर लें। अगर कर भी लें तो क्या हिम्मत वो पुलिस स्टेशन में बैठकर अपनी परेशानी बता भी सकें। मैं क्राइम रिपोर्टिंग के लिए थानों में गया हूं। देखा है कैसे लोग शिकायत दर्ज करने के लिए सर सर कहते रहते हैं। खड़े खड़े। हाथ जोड़े। परेशान आदमी को एक गिलास पानी भी नहीं मिल सकता। अगर किसी ने हिम्मत करके बैठने की कोशिश भी कर ली तो कोई भी आता है और डपटकर दूसरी तरफ भेज देता है। मैंने अंग्रेज़ नहीं देखे, उनका शासन नहीं देखा, लेकिन पुलिस वालो की ये हरकतें देखकर लगता है कि वो हमारी मदद के लिए नहीं बल्कि शासन करने के लिए बैठे हैं। आम लोगों को गुलाम समझने के लिए बैठे हैं।
खैर बात पत्रकार की थी। पत्रकार का वीडियो देखिए। मैं खौफ देख रहा हूं। इंसाफ़ मांगिए। पुलिस वालों के लिए सज़ा मांगिए।

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