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वरुण गांधी का कांग्रेस में जाना उनके लिए कितना सही कितना गलत?

38 वर्षीय फिरोज वरुण गांधी के कांग्रेस पार्टी में जाने के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीति में कयास का बहुत बड़ा खेल होता है, इन कयासों के दम पर कितने गांठ बनते हैं और कितने ही टूट जाते हैं। मीडिया इंडस्ट्री तो राजनीति से जुड़े आधे खबर को कयास के दम पर चला लेती है। राजनीतिक पंडितो के जब सूत्र काम करना बंद कर देते हैं तो वो कयास के दम पर अपना पांडित्य दिखाते हैं।

वैसे बात आज हम कर रहे हैं उन कयासों के जिसमें यह माना जा रहा है कि वरुण कांग्रेस में जा रहे हैं। वरुण के कांग्रेस में जाने न जाने का फैसला तो उनका होगा लेकिन उनके नफा नुकसान की चर्चा हम जरूर कर सकते हैं।

भारतीय राजनीति के इतिहास के सबसे शक्तिशाली नेता माने जाने वाली इंदिरा गांधी के पौत्र वरुण ने 38 वसंत और पतझड़ साथ-साथ देखें हैं। छोटे उम्र में ही पिता संजय गांधी को खोने के बाद वरुण और उनकी माँ मेनका गांधी के ऊपर मानो दुख का पहाड़ टूट गया। गांधी नेहरू परिवार से उन दोनों को धक्के मार कर निकाल दिया गया और शायद सब दिन के लिए दरबाजे को बंद कर दिए गए। इतना ही नहीं याद करिए 1984 का अमेठी लोकसभा सीट जहाँ कभी संजय गांधी सांसद होते थे, वहा से जब मेनका गांधी ने संजय विचार मंच के टिकट पर पर्चा भरा तो राजीव गांधी ने उन्हें टक्कर दी और अपने छोटे भाई के विधवा को लगभग 3 लाख मतों से हराकर राजनीति के मंच से लगभग उतार दिया।

1988 में मेनका ने कांग्रेस विरोध में एकजुट हुए दल जनता दल का दामन थाम लिया और 1989 में पीलीभीत से सांसद बनी, राजनीति का चक्र घूमता रहा और 1996 में सोनिया गांधी के करीबी लालू प्रसाद जनता दल के अध्यक्ष थे और उन्होंने मेनका गांधी को जनता दल से 7 वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया।

मेनका का राजनीतिक जीवन लगभग खत्म हो चुका था और ऐसे समय में डूबते को तिनके का सहारा मिला और अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोग से 1999 में फिर मेनका लोकसभा पहुंची। निर्दलीय होते हुए भी केंद्र में मंत्री बनाया गया।2004 में मेनका और वरुण ने बीजेपी जॉइन कर ली यह एक ऐतिहासिक घटना थी जब गांधी परिवार के वंशज ने RSS के सामने नतमस्तक कर दी थी।

मात्र 5 वर्ष के भीतर वरुण गांधी को गांधी नेहरू परिवार से होने का फायदा मिला और उन्हें औऱ उनकी माँ दोनों को ही लोकसभा का टिकट मिल गया उस पार्टी से जिसमे विधायकी की टिकट लेने में 2 बार पार्टी के अध्यक्ष रह चुके राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह को उसी उत्तर प्रदेश में सक्रिय राजनीति में आने के बाद 20 वर्ष लग गए।

इतना ही नहीं वर्ष 2013 में वरुण BJP के सबसे कम उम्र के महासचिव भी बन गए। वर्ष 2016 आते-आते वरुण की चर्चा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में होने लगी। इलाहाबाद में पार्टी के सम्मेलन से पूर्व वरुण के भीतर संजय गांधी के गुण दिखने लगे अब के प्रयाग शहर के हर चौक चौराहे को उनके समर्थकों ने पोस्टरों से पाट दिया। यहीं वो सम्मेलन था जिसके बाद RSS और नरेन्द्र मोदी के समर्थकों को ये लगने लगा कि नेहरू का यह वंशज BJP के शीर्ष पद की तरफ काफी तेजी से बढ़ रहा है। नेहरू के समाजवाद के विरुद्ध राजनीति करने वाली संगठन RSS कभी भी उनके वंशज को शीर्ष तक पहुंचता नहीं देख सकती थी। हाल के दिनों में वरुण गांधी के लेखों और किताबों को आप देखिए वो पूर्ण रूप से नेहरू के विचारों की तरफ बढ़ते हुए दिखेंगे।

लेकिन तमाम कयासों के बीच एक यक्ष प्रश्न यह है कि क्या जिस शीर्ष पद तक पहुंच पाने के उम्मीद टूटने पर वरुण BJP से जा सकते हैं क्या वो पद उन्हें कांग्रेस में मिलेगा? लेकिन राजनीतिक पंडितों का एक वर्ग यह मानता है कि नम्बर एक नहीं तो नम्बर 2 तक कांग्रेस में पहुंचना वरुण के लिए संभव हो सकता है।

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