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रिपोर्ट

बनारस के सीवर में मारे गए दलितों की मौत पर प्रधानमंत्री, नेता और देशभक्त एंकर क्यों चुप हैं?

बीती 1 मार्च को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में सीवर पाइप लाइनों की सफाई के लिए टैंक के अंदर उतरे दो सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई.

यह घटना इलाहाबाद कुम्भ में प्रधानमंत्री मोदी के सफाईकर्मियों के पैर धोने के बाद घटित हुई है। ऐसे में बनारस के एमपी यानी देश के पीएम द्वारा इलाहाबाद में दलितों के पांव पखारे जाने के इवेंट का दलितों के ‘उद्धार’ से क्या कोई संबंध है? इलाहाबाद से बनारस कितनी दूर है?

घटना पाण्डेयपुर इलाके में कालीमंदिर के पास तब घटित हुई, जब वाराणसी के शिवपुर के निवासी चंदन, बिहार के मोतिहारी निवासी राजेश और उमेश को हमारे शासन-प्रशासन और मनुवादी समाज ने सीवर लाइन की सफाई के लिए 40 फीट गहरे मेनहोल में उतारा।

मेनहोल की दीवार खिसकने के कारण वह तीनों उसमें फंस गए। तीनों के पास कोई सुरक्षा उपकरण नहीं था इसलिए मल के तेज प्रवाह के और जहरीली गैस के कारण चंदन व राजेश को मौत ने मुंह में निगल लिया और उमेश मौत का मुंह देखकर किसी तरह से बच गए। इससे पहले भी 11 नवम्बर को वाराणसी में सीवर सफाई के दौरान दिनेश पासवान (27) और उसके भतीजे विकास (18) की मौत हो चुकी है।

बनारस में सीवर में मार दिए गए दलितों की अंतिम यात्रा में कौन-कौन सा सांसद, कौन-कौन सा मिनिस्टर शामिल हुआ? क्या देश के मनुष्यों की इन मौतों से किसी को कोई फ़र्क़ पड़ता है? क्या मनुस्मृति के विधान मानने वाले इन मनुष्यों को मनुष्य मानते हैं?

आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?

इन हत्याओं के लिए सबसे पहले और बाद तक वही मनुवाद ज़िम्मेदार है जिसकी शाखा संघ जिसे हिंदुत्व कहती है और जिस पर सवार होकर वह इन दिनों देश और ‘जनमानस’ पर काबिज है। इससे पहले की सत्ताएं भी जिसके असर में रही ही हैं। बस वे पूरी तरह इसमें डूबी नहीं थीं, उनके भीतर इससे असहमत या आधे-अधूरे मन से ही इसे चुनौती देने वाले लोग होते थे और उनके पास हिंदुत्व का ऐसा पेटेंट नहीं था। वही मनुस्मृति जो सवर्ण और शूद्र बनाने की धूर्त-बर्बर व्यवस्था को संवैधानिक और धार्मिक करार देती है।

इन हत्याओं के लिए यह समाज ज़िम्मेदार है जिस पर काबिज सवर्ण अपनी धार्मिक बर्बरता की वजह से इन हत्याओं को सहज रूप से ज़रूरी महसूस करता है। वे शूद्र जातियां भी जिन्हें विमर्शकार नये द्विज और सामाजिक न्याय वाले ओबीसी, मोस्ट ओबीसी वगैराह नामों से पुकारते हैं और जिनके नुमाइंदे सत्ताओं में आए तो ऐसे मसलों पर विचलित या संवेदनशील नहीं हो सके। अफ़सोस कि वे अति शूद्र नेता/नेत्री भी नहीं जिन्हें अपने दायित्वों से ज्यादा कथित सोशल इंजीनियरिंग और ‘हाथी नहीं गणेश…ब्रह्मा, विष्णु, महेश’ जैसे फेक स्लोगन ज़रूरी लगने लगते हैं। क्रांति के वे ‘प्रतीक्षारत’ भी जिनका वादा रहा, वर्ग विजय होगी तो सब नासूर खुद ब खुद मिट जाएंगे।

इन हत्याओं के लिए यह राष्ट्र ज़िम्मेदार है जिसके बीहाफ पर कोई भी क्रिमिनल एंकर न्याय का सवाल उठाने वालों पर हमलावर होता है, ‘नेशन वांट्स टु नो..’। वे एंकर, वे पत्रकार, उनके मालिकान जो सवाल उठाने वालों को देशद्रोही और हत्यारों को मसीहा प्रचारित करते हैं।

इन हत्याओं के लिए आर्यावर्त में सदियों से चली आ रही वह आरक्षण व्यवस्था ज़िम्मेदार है जो अछूतों के लिए सीवर आरक्षित करती है और जिसकी तर्ज़ पर आज के मनु उत्पीड़कों के लिए 10 फीसदी और श्रेष्ठ अवसर आरक्षित कर देते हैं।

एक दोस्त सुबह पूछ रहे थे कि कोई अलां जाति, कोई फलां जाति न महसूस करे देशभक्ति के माहौल में। क्या इस माहौल में कोई कहेगा कि रुकिए आप और हम एक हैं। आज सीवर में हम उतरते हैं?

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