लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

कला एवं साहित्य

जन्मदिन विशेष: मौन की कोई आवाज होती होगी तो वह निर्मल वर्मा जैसी होती होगी

राघवेन्द्र शुक्ला

अतीत की स्मृतियां बहुत महत्वपूर्ण लगने लगती हैं, जब हम निर्मल वर्मा को पढ़ते हैं। लगता है कि एकांत और असामाजिकता भी सृजन की बेहतरीन जमीन हो सकती है। निर्मल वर्मा के उपन्यास और अनेक कहानियां पढ़ने के बाद भी आप उनकी आवाज नहीं महसूस कर सकते। क्योंकि, मौन की कोई ध्वनि नहीं होती। उन्हें पढ़ते हुए एक दृश्य उभरता है जहां एक एकांतवासी, गंभीर और मितभाषी साहित्यकार अपनी समस्त स्मृतियों को सामने देख रहा है और उन्हें लिखता जा रहा है।

निर्मल की कहानियां आलोचकों को देशी परिदृश्य की नहीं लगतीं। उनके साहित्य को देशी आलोचक स्वदेशी मानने से कतराते दिखते हैं। निर्मल का स्रोत पाश्चात्य साहित्य का ज्यादा लगता है। सवाल यह है कि देशीपने का मतलब क्या? निर्मल जिस जोन के साहित्यकार हैं, वहां अगर पाश्चात्य साहित्यत्व का स्रोत न हो तो शायद जो बातें उन्होंने कहीं, वह कभी न कह पाते। एकांतवास की मानस परिस्थितियों की व्याख्या भारत की सामाजिक और पारिवारिक संस्कृति के साए में उगी भाषा के माध्यम से हो पाना संभव ही नहीं था।

निर्मल यह बात जानते थे। वह कहते भी थे कि भारत में निजता का साहित्य बहुत कठिन है। संयुक्त परिवार या फिर किसी भी परिवार की सामूहिक संस्कृति के वातावरण में किसी के लिए अपनी निजता को सुरक्षा देना और उसे पोषित करना आसान नहीं है। यह बहुत कम लोग कर पाते हैं। यहां प्राइवेसी जैसे शब्द अभी तक सामाजिक मान्यता प्राप्त नहीं कर सके हैं तो सोचा जा सकता है कि निर्मल वर्मा के समय में उनकी स्थिति क्या रही होगी। इसलिए, भारत में नई कहानी का सूत्रपात करने वाले निर्मल की कहानियां पाश्चात्य साहित्य के आवरण में दिखती हैं तो इसके पीछे मानसिक एकांत और निजी अस्तित्व के प्रति हमारी अस्वीकार्यता का ज्यादा योगदान है।

निर्मल वर्मा ने एक साक्षात्कार में कहा था, ‘पहाड़, भिक्षुक, लामा, फ़कीर, सूनी दुपहरें… ये ऐसे बिम्ब हैं जिसके बीच मेरी कल्पना ने अपना परिवेश निर्मित किया…बचपन के वे बिम्ब, जिन्हें शब्दों में ढालते हुए समूचा जीवन बीत गया और फिर लगता है जो कुछ भी बना है, वह उससे बहुत कम है, जो अछूता बंजर और आकारहीन पड़ा है… जब कोई मुझसे पूछता है आपके लिखने के प्रेरणास्त्रोत क्या रहे, तो मैं एकाएक जवाब नहीं दे पाता. हवा में ताकता रहता हूं. किताबें, यात्राएं, चेहरे, बीते हुए लोग और शहर; बचपन के दोस्त और टीचर… क्या कोई एक कांटा है, जिसे पकड़कर कह सकूं – इसकी चुभन ने मुझे पहली बार जगाया था… मृत्यु की छाया बहुत पहले से एक अनलिखी लिपि की तरह लिखे शब्दों के बीच मंडराती रही.’ 

सम्मान

मूर्तिदेवी पुरस्कार, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म भूषण, राम मनोहर लोहिया अतिविशिष्ट सम्मान, साधना सम्मान, साहित्य अकादेमी की महत्तर 

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