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एक बार फिर 20 जुलाई को किसान क्यों करेंगे ट्रैक्टरों के साथ सरकार का घेराव

संदीप सिंगरोहा

सरकार द्वारा किसान विरोधी तीन अध्यादेशों के खिलाफ हरियाणा-पंजाब के किसान 20 जुलाई को ट्रैक्टरों के साथ विरोध प्रदर्शन करने की तैयारी में हैं। ट्रैक्टर आन्दोलन में भाग लेने के लिए छोटे बड़े हर किसान से सहयोग की उम्मीद है। जरूरी नहीं है कि आपके पास ट्रैक्टर हो ही लेकिन आपके पास अपनी पहचान को बचाने का ज़ज्बा जरूर होना चाहिए। किसानी तबके के पढ़े-लिखे शुभचिंतक सभी किसान साथियों से इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील कर रहें हैं ताकि हम अपनी फसल और किसान नस्ल दोनों को बचा सकें।

किसान भाईयों अभी हाल में सरकार जो तीन नए कानून किसानों के लिए लाई है – तीनों के तीनों किसान को खत्म करने की साजिश हैं। इन अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है। ये तीनों अध्यादेश भारत के करोड़ों किसान परिवारों के भविष्य से जुड़े हुए हैं। एक तरफ सरकार व अनेक अर्थशास्त्री इस बात को मानते हैं कि कोरोनावायरस काल में सिर्फ किसानों की मेहनत/कृषि क्षेत्र के आधार पर ही देश की अर्थव्यवस्था का पहिया घूम रहा है, वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार MSP पर खरीद बन्द कर के किसानों का शोषण करने में लगी हुई है। अगर देखा जाए तो आज भी किसानों को C2+50% के अनुसार फसलों का MSP नहीं मिल रहा है लेकिन उसके बावजूद किसान किसी तरह अपना जीवनयापन कर रहे हैं। यदि सरकार ने MSP पर खरीद को बंद कर दिया तो खेती किसानी के साथ-साथ देश की खाद्यान सुरक्षा भी बड़े संकट में फंस जाएगी। लेकिन इसके लिए क्या हम सही से आवाज़ उठा रहे हैं? क्या मीडिया ने इस विषय पर थोड़ा-सा भी समय निकाला है? ऐसे माहौल में जब नेशनल मीडिया अमीरों और किसान विरोधियों को सिर आँखों पर बैठा कर समय बर्बाद कर रही है तब हमें खुद ही अपनी बात रखनी होगी। किसान भाईयों यह हमारे अस्तित्व का संकट है।

केंद्र सरकार की मंशा

इन अध्यादेशों के जरिये आने वाले समय में केंद्र सरकार किसानों को मिलने वाले MSP को खत्म करने जा रही है। केंद्र सरकार का दावा है कि इन अध्यादेशों से देश के किसानों को फायदा होगा लेकिन असल में इससे किसानों को नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों को ही फायदा होगा। यह बात आप सब जानते ही होंगे कि हमारी केंद्र सरकार के ऊपर WTO का दबाव है। ये सब मिलकर किसानों को मिलने वाला MSP एवम् हर प्रकार की सब्सिडी केंद्र सरकार समाप्त करने की कोशिश में हैं। इस से पहले भी कांग्रेस व बीजेपी की सरकारों ने MSP को खत्म करने की तरफ कदम बढ़ाने की असफल कोशिश की थी लेकिन किसानों के दबाव के सामने उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे। अब केंद्र सरकार कोरोनावायरस के कारण लगे लॉकडाउन का अनैतिक फायदा उठाकर ये तीनों अध्यादेश लेकर आई है। सरकार को लगता है कि कोरोनावायरस के कारण किसान बड़े पैमाने पर इकठ्ठे हो कर प्रदर्शन नहीं कर सकते इसलिये सरकार ने यह कदम उठाया। किसानों के विरोध को भांपने के लिए अब की बार मक्के व मूंग का एक भी दाना MSP पर नहीं खरीदा गया, आगे आने वाले समय में केंद्र सरकार गेहूं व धान की MSP पर खरीद भी बन्द करने की दिशा में बढ़ रही है।

केंद्र सरकार जो तीन कृषि अध्यादेश ले के आई है, हम उन्हें विस्तार से आपके सामने रखते हैं।

1). पहला अध्यादेश – Farmer’s Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Ordinance

इस के तहत केंद्र सरकार “एक देश, एक कृषि मार्किट” बनाने की बात कह रही है। इस अध्यादेश के माध्यम से पैन कार्ड धारक कोई भी व्यक्ति, कम्पनी, सुपर मार्केट आदि किसी भी किसान का माल किसी भी जगह पर खरीद सकते हैं। कृषि माल की बिक्री APMC यार्ड में होने की शर्त केंद्र सरकार ने हटा ली है। महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि कृषि माल की जो खरीद APMC मार्किट से बाहर होगी, उस पर किसी भी तरह का टैक्स या शुल्क नहीं लगेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि APMC मार्किट व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी क्योंकि APMC व्यवस्था में टैक्स व अन्य शुल्क लगते रहेंगे। इस अध्यादेश के तहत किसानों का माल खरीदने वाले पैन कार्ड धारक व्यक्ति, कम्पनी या सुपर मार्केट को तीन दिन के अंदर किसानों के माल की पेमेंट करनी होगी। सामान खरीदने वाले

व्यक्ति या कम्पनी और किसान के बीच विवाद होने पर SDM इसका समाधान करेंगे। पहले SDM द्वारा सम्बन्धित किसान एवम् माल खरीदने वाली कम्पनी के अधिकारी की एक कमेटी बना के आपसी बातचीत के जरिये समाधान के लिए 30 दिन का समय दिया जाएगा, अगर बातचीत से समाधान नहीं हुआ तो

SDM द्वारा मामले की सुनवाई की जाएगी। SDM के आदेश से सहमत न होने पर जिला अधिकारी के पास अपील की जा सकती है। SDM और जिला अधिकारी को 30 दिन में समाधान करना होगा। एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि किसान व कम्पनी के बीच विवाद होने की स्थिति में इस अध्यादेश के तहत कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता। यहां पर गौर करने की बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारी हमेशा सरकार के दबाव में रहते हैं और सरकार हमेशा व्यापारियों व कम्पनियों के पक्ष में खड़ी होती है क्योंकि चुनावों के समय व्यापारी और कम्पनियाँ राजनीतिक पार्टियों को चंदा देती हैं। ये न्यायालय सरकार के अधीन नहीं होते और न्याय के लिए कोर्ट में जाने का हक हर भारतीय को संविधान में दिया है, नए अध्यादेश की वजह से किसानों को न्याय मिलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि केंद्र सरकार ने इस बात की कोई गारंटी नहीं दी है कि प्राइवेट पैन कार्ड धारक व्यक्ति, कम्पनी या सुपर मार्किट द्वारा किसानों के माल की खरीद MSP (समर्थन मूल्य) पर होगी। केंद्र सरकार के इस अध्यादेश से सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब फसलें तैयार होंगी, उस समय बड़ी-बड़ी कम्पनियां जानबूझकर किसानों के माल का दाम गिरा देंगी और उसे बड़ी मात्रा में स्टोर कर लेंगी जिसे वे बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगी।

मंडियों में किसानों की फसलों की MSP पर खरीद सुनिश्चित करने के लिए व व्यापारियों पर लगाम लगाने के लिए APMC एक्ट अलग-अलग राज्य सरकारों द्वारा बनाया गया था। कानून के अनुसार APMC मंडियों का कंट्रोल किसानों के पास होना चाहिए लेकिन वहां भी व्यापारियों ने गिरोह बना के किसानों को लूटना शुरू कर दिया। APMC एक्ट में जहां एक तरफ कई समस्याएं हैं जिनमें सुधार की जरूरत है, वहीँ दूसरी तरफ इसका एक सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके तहत सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि किसानों के माल की खरीद MSP पर हो। अब नए अध्यादेश के जरिये सरकार किसानों के माल की MSP पर खरीद की अपनी ज़िम्मेदारी व जवाबदेही से बचना चाहती है। जब किसानों के समान की खरीद निश्चित स्थानों पर नहीं होगी तो सरकार इस बात को रेगुलेट नहीं कर पायेगी कि किसानों के माल की खरीद MSP पर हो रही है या नहीं। APMC Act में सुधार की आवश्यकता है लेकिन उसे खारिज़ कर के किसानों के माल खरीदने की इस नई व्यवस्था से किसानों का शोषण बढ़ेगा। उदाहरण के तौर पर 2006 में बिहार सरकार ने APMC एक्ट खत्म कर के किसानों के उत्पादों की MSP पर खरीद खत्म कर दी। उसके बाद किसानों का माल MSP पर बिकना बन्द हो गया और प्राइवेट कम्पनियाँ किसानों का सामान MSP से बहुत कम दाम पर खरीदने लगी जिस से वहां किसानों की हालत खराब होती चली गयी और उसके परिणामस्वरूप बिहार में किसानों ने बड़ी संख्या में खेती छोड़ के मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों का रुख किया।

2). दूसरा अध्यादेश Essential Commodity Act 1955 में बदलाव के लिए लागू किया गया है –

पहले व्यापारी फसलों को किसानों के औने-पौने दामों ओर खरीदकर उसका भंडारण कर लेते थे और कालाबाज़ारी करते थे, उसको रोकने के लिए Essential Commodity Act 1955 बनाया गया था जिसके तहत व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक लगा दी गयी थी। अब इस नए अध्यादेश के तहत आलू, प्याज़, दलहन, तिलहन व तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा लिया गया है। अब समझने की बात यह है कि हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है यानि यह अध्यादेश बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी के लिए लाया गया है, ये कम्पनियाँ तथा सुपर मार्किट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे।

3). तीसरा अध्यादेश सरकार द्वारा कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए लागू किया गया है जिसका नाम है – The Farmers Agreement on Price Assurance and Farm Services Ordinance

इसके तहत ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ को बढ़ावा दिया जाएगा जिसमें बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ खेती करेंगी और किसान उसमें सिर्फ मजदूरी करेंगे। इस नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के रह जायेगा। इस अध्यादेश के जरिये केंद्र सरकार कृषि का पश्चिमी मॉडल हमारे किसानों पर थोपना चाहती है लेकिन सरकार यह बात भूल जाती है कि हमारे किसानों की तुलना विदेशी किसानों से नहीं हो सकती क्योंकि हमारे यहां भूमि-जनसंख्या अनुपात पश्चिमी देशों से अलग है और हमारे यहां खेती-किसानी जीवनयापन करने का साधन है वहीं पश्चिमी देशों में यह व्यवसाय है। वैसे भी ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ से इटली और रोमानिया जैसे देशों के किसान अपनी ही जमीन पर दाम देकर खेती करते और करवाते हैं। उन्हें बार-बार जमीन नीलामी और बेकारी के भय से गुजरना पड़ता है। अनुभव बताते हैं कि ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ से किसानों का शोषण ही होता है। पिछले साल गुजरात में ‘पेप्सिको कम्पनी’ ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था जिसे बाद में किसान संगठनों के विरोध के चलते कम्पनी ने वापस ले लिया था। ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ के तहत फसलों की बुआई से पहले कम्पनियां किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं लेकिन बाद में जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कम्पनियाँ किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं और बाद में किसानों के उत्पाद को खराब बता कर रिजेक्ट कर दिया जाता है।

केंद्र सरकार का कहना है कि इन तीन कृषि अध्यादेशों से किसानों के लिए ‘फ्री मार्किट’ की व्यवस्था बनाई जाएगी जिससे किसानों को लाभ होगा लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि अमेरिका व यूरोप में ‘फ्री मार्किट’ यानि बाजार आधारित नीति लागू होने से पहले 1970 में रिटेल कीमत की 40% राशि किसानों को मिलती थी, अब ‘फ्री मार्किट’ नीति लागू होने के बाद किसानों को रिटेल कीमत की मात्र 15% राशि मिलती है यानि ‘फ्री मार्किट’ से कम्पनियों व सुपर मार्किटों को ही फायदा हुआ है। ‘फ्री मार्किट’ नीति होने के बावजूद किसानों को जीवित रखने के लिए यूरोप में किसानों को हर साल लगभग 7 लाख करोड़ रुपये की सरकारी मदद मिलती है। अमेरिका व यूरोप का अनुभव बताता है कि ‘फ्री मार्किट’ नीतियों से किसानों को अच्छा खासा नुकसान होता है। इसकी भरपाई यूरोप में सरकारी मदद से पूरी करने की कोशिश जरूर होती है जिसकी हमारे देश में कमी है, लगभग नदारद है।

अगर किसानों का फायदा करना सरकार की मंशा होती तो केंद्र सरकार को APMC एक्ट में सुधार करना चाहिए और 1999 में तमिलनाडु में लागू की गई “उझावर संथाई” योजना पूरे देश में लागू करनी चाहिए। इस योजना के तहत 1999 में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने किसानों एवम् ग्राहकों के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए इस योजना को शुरू किया था। इसके तहत तमिलनाडु में “उझावर संथाई” मार्किट स्थापित की गई जहां पर किसान सीधे आ कर अपना माल बेचते हैं और वहां पर ग्राहक सीधे किसानों से माल खरीदते हैं। इस योजना से खुले मार्किट के मुकाबले किसानों को 20% ज्यादा कीमत मिलती है और ग्राहकों को 15% कम कीमत पर सामान मिलता है। इन मार्किटों के कड़े नियमों के अनुसार सिर्फ किसान ही अपना माल बेच सकता है और किसी व्यापारी को इन मार्किटों में घुसने की अनुमति नहीं होती। सम्पूर्ण दस्तावेज चेक करने के बाद ही किसान इस मार्किट में अपना सामान बेच सकते हैं। इन मार्किटों में किसानों से दुकान का कोई किराया नहीं लिया जाता और किसानों को अपना माल स्टोर करने के लिए राज्य सरकार द्वारा फ्री में कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था दी जाती है। इसके साथ साथ “उझावर संथाई” मार्किट से जुड़े किसानों को अपना माल लाने के लिए सरकारी बसों में फ्री ट्रांसपोर्ट सुविधा मिलती है।

यदि समय रहते किसान नहीं जागे तो WTO के दबाव में केंद्र सरकार किसानों की फसलों की MSP पर खरीद बन्द कर देगी और किसानों के लिए जीवनयापन करना भी बहुत मुश्किल हो जाएगा। तीन कृषि अध्यादेशों के खिलाफ यह आंदोलन किसानों के भविष्य व अस्तित्व को बचाने की निर्णायक लड़ाई है, अतः सभी किसान बन्धु सरकार की इन किसान विरोधी नीतियों को समझें और अधिक से अधिक किसानों को जागरूक कर किसान आंदोलन में सहयोग करें। हम देश के सभी गैर-राजनीतिक किसान संगठनों से यह निवेदन करते हैं कि अपने आपसी विरोधाभास भूला कर देश के किसानों के अस्तित्व व भविष्य को बचाने की इस लड़ाई के लिए एकजुट हों।

लेखक किसान यूनियन के माध्यम से किसानों की आवाज़ उठाते रहते हैं।

साभार: मलोटा फोक

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