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कला एवं साहित्य

हे 62 कलाकारों, तुम्हारे कुकर्मों के लिए आने वाली पीढ़ियों को ज़िल्लत भरी ज़िंदगी बितानी न पड़ जाए

49 कलाकारों ने प्रधान मंत्री को पत्र लिखा कि देश में लगातार बढ़ रही ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएँ रोकी जानी चाहिए, और इस माहौल पर चिंता जाहिर की कि ‘जय श्रीराम’ एक युद्धघोष बनता जा रहा है। इसपर 62 कलाकारों ने उनका प्रतिवाद किया, उन्हें ‘असहिष्णुता गैंग’ का सदस्य बताया, प्रधान मंत्री और सरकार की नीतियों का पुरजोर समर्थन किया और 49 कलाकारों से पूछा कि ‘तब कहाँ थे जब… …’ वगैरह-वगैरह।

जिस बात के जवाब में जो बातें कही गयीं, उसका मतलब यह निकलता है कि, (i) पहले जो-जो भी हुआ, मॉब लिंचिंग उसी का जवाब है और यह सर्वथा उचित है, (ii) मॉब लिंचिंग का विरोध करना इस सरकार का विरोध करना है और समर्थन करना इस सरकार का समर्थन करना है,(iii) मॉब लिंचिंग सरकार की नीति है, या उसे सरकार का समर्थन प्राप्त है, (iv) मॉब लिंचिंग का समर्थन करना इस सरकार का समर्थक होने के लिए ज़रूरी है।

49 कलाकारों का विरोध करने वाले 62 कलाकारों में प्रसून जोशी भी शामिल हैं जो अति-भावुकतापूर्ण रूमानी गाने लिखने के साथ ही देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों के लिए जनता को यह भी सन्देश देते रहे हैं कि ‘ठंडा मतलब कोकाकोला’ फासिज्म समर्थक कला में एक किस्म का अतार्किक भावावेग होता है, अतिशय रूमानी भावुकता होती है, एक किस्म का अतीत-राग या नौस्टेल्जिया होता है, मेलोड्रामा होता है और ये सारी चीज़ें मध्य वर्ग को बहुत अपील करती हैं।

इटली और जर्मनी में भी ऐसे बहुत सारे लेखक-कलाकार थे जो गत शताब्दी के तीसरे-चौथे दशक में फासिस्टों और नात्सियों के अंध-समर्थक और प्रचारक बन गए थे। कुछ ने अपनी चमड़ी बचाने या तात्कालिक लाभ के लिए भी यह सब कुछ किया। इतिहास ने उन्हें अंततः हत्यारों के जुलूस में बत्ती-बाजा लेकर चलने की घृणास्पद हरक़त के लिए सज़ा मुक़र्रर की। आज के इटली और जर्मनी में उन फासिस्ट-समर्थक कलाकारों के वंशज अपने पूर्वजों की पहचान तक छिपाते हैं और शर्मिन्दगी भरा जीवन बिताते हैं। कुछ गधे समझते हैं कि हिन्दुत्ववादी फासिज्म का यह दौर एक नया युग है जो चिर काल तक जारी रहेगा। यह एक भारी भ्रम है। भ्रमों में जीना कभी-कभी बहुत महँगा पड़ जाता है!

चौराहे पर उल्टा लटका दिए जाने से चन्द वर्षों पहले तक मुसोलिनी, और अपने बंकर में लाल सेना से घिरा हुआ खुद को गोली मार लेने से दो वर्षों पहले तक हिटलर भी यही सोचते थे कि वे जिस साम्राज्य की नींव डाल रहे हैं वह सैकड़ों वर्षों तक चलता रहेगा। लेकिन बर्बरता का मज़बूत से मज़बूत साम्राज्य भी अल्पायु ही होता है। फासिज्म की विजय कभी भी स्थायी नहीं हो सकती। आज चाहे निराशा जितनी भी गहरी हो, लेकिन यह अन्धकार युग हमेशा के लिए नहीं आया है।

अतः, हे 62 कलाकारो, सोचो ज़रा! कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में तुम्हारे काले कुकर्मों के लिए तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को भी मुँह छिपाकर ज़िल्लत और शर्मिन्दगी भरी ज़िंदगी बितानी पड़े। मत भूलो कि जिन हत्यारों की अभ्यर्थना में तुम घुटनों के बल झुके हुए हो, वे एक दिन तख्ते-ताऊस से घसीट कर नीचे उतारे जायेंगे और गलियों में रगेदे जायेंगे।

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