लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

राजनीति रिपोर्ट

कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में छात्र नेताओं का आजीवन निष्कासन, आंदोलित छात्रों की हालत गंभीर

जेएनयू तो खास निशाने पर है ही, बाकी विश्वविद्यालयों में भी प्रतिरोध की हर आवाज़ के दमन के अभियान जारी हैं। हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी (केयू) में छात्रों की मांगों के लिए आंदोलन करने का सिला छात्र नेताओं के आजीवन निष्कासन के रूप में दिया गया है।

शर्मनाक बात यह है कि कुलपति ने यह कार्रवाई आंदोलनकारियों से समझौता वार्ता के बाद गुपचुप ढंग से की। पांच दिनों से आमरण अनशन पर बैठे छात्र-छात्राओं की हालत गंभीर होती जा रही है पर कुलपति ने अडियल रवैया अख्तियार कर रखा है।

संयुक्त छात्र संघर्ष समिति, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के बैनर तले सात स्टूडेंट लीडर्स 27 मार्च से आर्ट डिपार्टमेंट के बाहर आमरण अनशन पर बैठे हुए हैं। इनमें एसएफआई की हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष सुमन, एसएफआई की ज्योति, विनोद गिल, पीएसओ के मोहित, इनसो दीपेंद्र बराड़, एएसडब्लयूए के रामलाल और डीएफएसवाई के प्रवीण शामिल हैं।

शत्रुतापूर्ण रवैये पर उतारु विश्वविद्यालय प्रशासन अनशनस्थल पर न एंबुलेंस का इंतजाम करने के लिए तैयार है, न डॉक्टर की व्यवस्था करने के लिए। कई आंदोलनकारियों को बीच में अस्पताल ले जाना पड़ा है लेकिन लगता है कि कुलपति आंदोलकारियों की जायज मांगों पर बातचीत तक के लिए तैयार होने के बजाय उनके जीवन और करियर को खत्म होते देखना चाहते हैं। अनशनकारियों के साथ सहानुभूति जताने के लिए पहुंचने वाले लोगों को भी कई बार प्रताड़ित किया जा रहा है।

अनशनकारियों के प्रमुख मांग 19 स्टूडेंट लीडर्स के निष्कासन और उन पर लगे प्रतिबंध को खत्म करने की है। भाजपा सरकारों के दौर के कुलपतियों की कार्यशैली एक सी है। केयू में भी कुलपति ने आंदोलन खत्म कराने के लिए समझौता वार्ता के बाद गुपचुप ढंग से निष्कासन और प्रतिबंध के नोटिस जारी किए। स्टूडेंट लीडर इस कार्रवाई को पीठ में छुरा घोंपने जैसी हरकत करार दे रहे हैं.

एसएफआई की केयू इकाई की अध्यक्ष ऋतु के मुताबिक, उनके संगठन का प्रतिनिधिमंडल 1 फरवरी को स्टूडेंट्स की समस्याओं को लेकर कुलपति से मिलने और ज्ञापन सौंपने के लिए गया था लेकिन उनके अधीनस्थों ने 4-5 दिनों के बाद आने के लिए कहकर उन्हें वापस भेज दिया। बार-बार की कोशिशों के बावजूद कुलपति से मिलने का समय नहीं मिल सका तो एसएफआई ने 13 फरवरी को कुलपति कार्यलय पर प्रदर्शन शुरू कर दिया। केयू के सिक्योरिटी ऑफिसर्स ने प्रदर्शनकारियों से डफली छीनने की कोशिश की और उन्हें नारे लगाने से रोकने की कोशिश की। धक्का-मुक्की के बावजूद प्रदर्शनकारी छात्र-छात्राओं ने कुलपति कार्यालय के सामने से हटने से इंकार कर दिया तो चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर राजेश ने तीसरे पहर में उनकी कुलपति से मुलाकात का आश्वासन दिया। तीसरे पहर भी काफी ना-नुकुर के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने शर्त रखी कि केवल दो स्टूडेंट्स कुलपति से मिल सकते हैं। एसएफआई ने कम से कम पांच स्टूडेंट्स के प्रतिनिधिमंडल को बातचीत की इजाजत की मांग की। कुछ देर बाद कुलपति अपने गार्ड्स के साथ स्टूडेंट्स की बातें सुने बिना ही निकल गए। स्टूडेंट्स ने उन्हें ज्ञापन देने की कोशिश की तो गार्ड्स ने फिर धक्कामुक्की की।

ऋतु के मुताबिक, अगले दिन एसएफआई कार्यकर्ता वीसी ऑफिस पर धरने पर बैठ गए तो केयू स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष एबीवीपी के ओमकार के साथ आए स्टूडेंट्स ने उन लोगों के साथ झड़प की। मौके पर पहुंची पुलिस की तत्कालीन डीसपी ने तान्या सिंह ने आंदोलकारियों को वीसी से बातचीत का वक्त दिलाने का वादा किया पर बार-बार की कोशिशों और झड़प से रास्ता निकलते नहीं निकला तो एसएफआई, एलएसयूआई, इनसो, एएसडब्ल्यूए. पीएसओ, डीएएफएसवाई और यूथ फॉर स्वराज संगठनों की संयुक्त संघर्ष समिति का गठन कर लिया गया। इन सभी संगठनों का आरोप है कि वीसी केवल एबीवीपी की बात सुनते हैं और पूरी तरह एक खास संगठन के कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं।

संघर्ष समिति ने 18 फरवरी के एक छोटे प्रदर्शन के बाद फिर से 28 फरवरी को वीसी ऑफिस पर बड़ा प्रदर्शन किया तो वीसी ने पुलिस बुला ली। पुलिस ने हल्का लाठीचार्ज कर 44 स्टूडेंट्स जिनमें 12 लड़कियां शामिल थीं, को हिरासत में ले लिया। इन सभी को शाम को छोड़ भी दिया गया।

1 मार्च को संघर्ष समिति ने वीसी को मरा हुआ घोषित कर उनकी शव यात्रा निकाली और 5 मार्च से भूख हड़ताल शुरू करने का ऐलान कर दिया। 4 मार्च को यूनिवर्सिटी प्रशासन ने संघर्ष समिति को इस शर्त पर बातचीत का न्यौता दिया कि बातचीत में एबीवीपी और भगवान परशुराम स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन के प्रतिनिधि भी शामिल रहेंगे। इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया।

आखिरकार 5 मार्च को वीसी ने संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की और 12 में से आठ मांगों को मान लेने की बात कही। चार मांगों पर एक सप्ताह के अंदर कमेटी बनाकर अगली कार्यवाही का आश्वासन दे दिया गया। आंदोलन खत्म हो गया और यूनिवर्सिटी की छुट्टियां शुरू हो गईं तो स्टूडेंट लीडर्स के पास रेस्टिकेशन और बैन के नोटिस पहुंचने शुरू हुए। जिन्हें रेस्टिकेट और बैन किया गया, उनमें एसएफआई के 13, इनसो के चार, एनएसयूआई व पीएसओ के एक-एक स्टूडेंट शामिल हैं। इनमें एसएफआई के सभी 13 और इनसो व एनएसयूआई के एक-एक स्टूडेंट को यूनिवर्सिटी ने आजीवन प्रतिबंधित कर दिया है।

बातचीत के बाद आंदोलन वापस करा देने के बाद अकारण और कोई चेतावनी का नोटिस जारी किए बिना आजीवन बैन जैसी कार्रवाई संघर्ष समिति के लिए हैरान कर देने वाली थी। यूनिवर्सिटी खुलने पर संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल यूनिवर्सिटी प्रशासन से मिला तो उन्हें माफी का पत्र लिखकर देने के लिए कहा गया। माफी मांगने का पत्र लिखने से इंकार कर स्टूडेंट्स की तरफ से यूनिवर्सिटी प्रशासन को पुनर्विचार के अनुरोध का पत्र दिया गया और कोई रास्ता न निकलते देख आमरण अनशन शुरू कर दिया गया। छात्र नेताओं ने बताया कि आंदोलन में शामिल छात्राओं के घरों पर फोन कर उन्हें प्रताड़ित कराने और होस्टल के कमरों पर ताला लगाने की धमकियों जैसे हथकंडे भी आजमाए जा रहे हैं।

अनशनकारियों की हालत बिगड़ रही है

आंदोलन को समर्थन दे रही संस्था आगाज के मलखान सिंह ने बताया कि कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय की संयुक्त छात्र संघर्ष समिति ने मीटिंग में फैसला लिया है कि 2अप्रैल को होने वाले प्रदर्शन को स्थगित कर दिया गया है। संघर्ष समिति ने फैसला लिया है कि 2 अप्रैल की केयू प्रशासन की मीटिंग में विद्यार्थियों के खिलाफ़ निर्णय जाता है तो 3 या 4 अप्रैल को बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *