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जन्मदिन विशेष: ओमप्रकाश वाल्मीकि को पढ़कर देखिए, साहित्य क्या होता है? पता लग जाएगा

ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म 30 जून 1950 को ग्राम बरला, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका बचपन सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों में बीता। उन्हें अनेक आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट व उत्पीड़न झेलने पड़े। हमारे समाज की दिक्कत यह है कि ओम प्रकाश वाल्मीकि देश के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले साहित्यकार होने के बावजूद दलित लेखक हैं, और कई लोग उन्हें सिर्फ दलित लेखक कहकर आज भी उन्हें छोटा करने की कोशिश करते हैं, मगर ओमप्रकाश जी साहित्य जगत की वो ऊंचाई हैं जिन्हें अब छू पाना मुमकिन नहीं। उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ का कुछ अंश यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, पढ़ा जाए


एक रोज हेडमास्टर कलीराम ने अपने कमरे में बुलाकर पूछा, ‘‘क्या नाम है बे तेरा ?’’
‘‘ओमप्रकाश,’’ मैंने डरते-डरते धीमे स्वर में अपना नाम बताया। हेडमास्टर को देखते ही बच्चे सहम जाते थे। पूरे स्कूल में उनकी दहशत थी।

‘‘चूहड़े का है ?’’ हेडमास्टर का दूसरा सवाल उछला।
‘‘जी ।’’
‘‘ठीक है…वह जो सामने शीशम का पेड़ खड़ा है, उस पर चढ़ जा और टहनियाँ तोड़के झाड़ू बणा ले। पत्तों वाली झाड़ू बणाना। और पूरे स्कूल कू ऐसा चमका दे जैसा सीसा। तेरा तो यो खानदानी काम है। जा…फटाफट लग जा काम पे।’’
हेडमास्टर के आदेश पर मैं स्कूल के कमरे, बरामदे साफ कर दिए। तभी वे खुद चलकर आए और बोले, ‘‘इसके बाद मैदान भी साफ कर दे।’’
लंबा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था, जिसे साफ करने से मेरी कमर दर्द करने लगी थी। धूल से चेहरा, सिर अँट गया था। मुँह के भीतर धूल घुस गई थी। मेरी कक्षा में बाकी बच्चे पढ़ रहे थे और मैं झाड़ू लगा रहा था। हेडमास्टर अपने कमरे में बैठे थे लेकिन निगाह मुझ पर टिकी थी। पाना पीने तक की इजाजत नहीं थी। पूरा दिन मैं झाड़ू लगाता रहा। तमाम अनुभवों के बीच कभी इतना काम नहीं किया था। वैसे भी घर में भाइयों का मैं लाड़ला था।

दूसरे दिन स्कूल पहुँचा। जाते ही हेडमास्टर ने फिर झाड़ू के काम पर लगा दिया। पूरे दिन झाड़ू देता रहा। मन में एक तसल्ली थी कि कल से कक्षा में बैठ जाऊँगा।
तीसरे दिन कक्षा में जाकर चुपचाप बैठ गया। थोड़ी देर बाद उनकी दहाड़ सुनाई पड़ी, ‘‘अबे, ओ चूहड़े के, मादरचोद कहाँ घुस गया…अपनी माँ…’’

उनकी दहाड़ सुनकर मैं थर-थर काँपने लगा था। एक त्यागी लड़के ने चिल्लाकर कहा, ‘‘मास्साब, वो बैट्ठा है कोणे में।’’
हेडमास्टर ने लपककर मेरी गर्दन दबोच ली थी। उनकी उँगलियों का दबाव मेरी गर्दन पर बढ़ रहा था। जैसे कोई भेड़िया बकरी के बच्चे को दबोचकर उठा लेता है। कक्षा से बाहर खींचकर उसने मुझे बरामदे में ला पटका। चीखकर बोले, ‘‘जा लगा पूरे मैदान में झाड़ू…नहीं तो गांड में मिर्ची डालके स्कूल से बाहर काढ़ (निकाल) दूँगा।’’
भयभीत होकर मैंने तीन दिन पुरानी वही शीशम की झाड़ू उठा ली। मेरी तरह ही उसके पत्ते सूखकर झरने लगे थे। सिर्फ बची थीं पतली-पतली टहनियाँ। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे थे। रोते-रोते मैदान में झाड़ू लगाने लगा। स्कूल के कमरों की खिड़की, दरवाजों से मास्टरों और लड़कों की आँखें छिपकर तमाशा देख रही थीं। मेरा रोम-रोम यातना की गहरी खाई में लगातार गिर रहा था।

मेरे पिताजी अचानक स्कूल के पास से गुजरे। मुझे स्कूल के मैदान में झाड़ू लगाता देखकर ठिठक गए। बाहर से ही आवाज देकर बोले, ‘‘मुंशी जी, यो क्या कर रा है ?’’ वे प्यार से मुझे मुंशी जी ही कहा करते थे। उन्हें देखकर मैं फफक पड़ा। वे स्कूल के मैदान में मेरे पास आ गए। मुझे रोता देखकर बोले, ‘‘मुंशी जी..रोते क्यों हो ? ठीक से बोल, क्या हुआ है ?’’
मेरी हिचकियाँ बँध गई थीं। हिचक-हिचककर पूरी बात पिताजी को बता दी कि तीन दिन से रोज झाड़ू लगवा रहे हैं। कक्षा में पढ़ने भी नहीं देते।
पिताजी ने मेरे हाथ से झाड़ू छीनकर दूर फेंक दी। उनकी आँखों में आग की गर्मी उतर आई थी। हमेशा दूसरों के सामने तीर-कमान बने रहनेवाले पिताजी की लंबी-लंबी घनी मूछें गुस्से में फड़फड़ाने लगी थीं। चीखने लगे, ‘‘कौण-सा मास्टर है वो द्रोणाचार्य की औलाद, जो मेरे लड़के से झाड़ू लगवावे है…’’
पिताजी की आवाज पूरे स्कूल में गूँज गई थी, जिसे सुनकर हेडमास्टर के साथ सभी मास्टर बाहर आ गए थे। कलीराम हेडमास्टर ने गाली देकर मेरे पिताजी को धमकाया। लेकिन पिताजी पर धमकी का कोई असर नहीं हुआ। उस रोज जिस साहस और हौसले से पिताजी ने हेडमास्टर का सामना किया, मैं उसे कभी भूल नहीं पाया। कई तरह की कमजोरियाँ थीं पिताजी में लेकिन मेरे भविष्य को जो मोड़ उस रोज उन्होंने दिया, उसका प्रभाव मेरी शख्सियत पर पड़ा।
हेडमास्टर ने तेज आवाज में कहा था, ‘‘ले जा इसे यहाँ से..चूहड़ा होके पढ़ने चला है…जा चला जा…नहीं तो हाड़-गोड़ तुड़वा दूँगा।’’
पिताजी ने मेरा हाथ पकड़ा और लेकर घर की तरफ चल दिए। जाते-जाते हेडमास्टर को सुनाकर बोले, ‘‘मास्टर हो…इसलिए जा रहा हूँ…पर इतना याद रखिए मास्टर…यो चूहड़े का यहीं पढ़ेगा…इसी मदरसे में। और यो ही नहीं, इसके बाद और भी आवेंगे पढ़ने कू।’’
पिताजी को विश्वास था, गाँव के त्यागी मास्टर कलीराम की इस हरकत पर उसे शर्मिदा करेंगे। लेकिन हुआ ठीक उल्टा। जिसका दरवाजा खटखटाया यही उत्तर मिला, ‘‘क्या करोगे स्कूल भेजके’’ या ‘‘कौवा बी कबी हंस बण सके’’, ‘‘तुम अनपढ़ गँवार लोग क्या जाणो, विद्या ऐसे हासिल ना होती।’’, ‘‘अरे ! चूहड़े के जाकत कू झाड़ू लगाने कू कह दिया तो कोण-सा जुल्म हो गया’’, ‘‘या फिर झाड़ू ही तो लगवाई है, द्रोणाचार्य की तरियों गुरु-दक्षिणा में अँगूठा तो नहीं माँगा’’ आदि-आदि।
पिताजी थक-हार निराश लौट आए, बिना खाए-पिए रात भर बैठ रहे। पता नहीं किस गहन पीड़ा को भोग रहे थे मेरे पिताजी। सुबह होते ही उन्होंने मुझे साथ लिया और प्रधान सगवा सिंग त्यागी की बैठक में पहुँच गए।
पिताजी को देखते ही प्रधान बोले, ‘‘अबे, छोटन…क्या बात है? तड़के ही तड़के आ लिया!’’

‘‘चौधरी साहब, तुम तो कहो ते सरकार ने चूहड़े –चमारों के जाकतों (बच्चों) के लिए मरदसों के दरवाजे खोल दिए हैं। और यहाँ वो हेडमास्टर मेरे इस जाकत कू पढ़ाने के बजाए क्लास से बाहर लाके दिन भर झाड़ू लगवावे है। जिब यो दिन भर मदरसे में झाड़ू लगावेगा तो इब तम ही बताओ पढ़ेगा कब?’’ पिताजी प्रधान के सामने गिड़गिड़ा रहे थे। उनकी आँखों में आँसू थे। मैं पास खड़ा पिताजी को देख रहा था।
प्रधान ने मुझे अपने पास बुलाकर पूछा, ‘‘कोण-सी किलास में पढ़े हैं?’’
‘‘जी चौथी में।’’
‘‘म्हारे महेन्द्र की किलास में ही हो?’’
‘‘जी।’’
प्रधान जी ने पिताजी से कहा, ‘‘फिकर ना कर, कल मदरसे में इसे भेज देणा।’’

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