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संवेदनात्मक ब्राह्मणवाद’ परोसती फिल्म- ‘आर्टिकल 15’

पिछड़े मूल्य परोसने वाली बहुत सारी फिल्मों की भीड़ में आर्टिकल 15 अच्छी फिल्म है, जिसमें विदेश में पढ़ा एक ब्राह्मण पुलिस अधिकारी जाति के सवालों से टकराता है और उसे एक नायक की ही तरह अकेले हल भी करता है, जबकि फिल्म में एक संवाद है कि “समस्यायों के हल के लिए किसी नायक का इंतजार मत करो।”  यूरोप के समाज में पढ़ा यह ब्राह्मण पुलिस अधिकारी नायक जितना भारत की जाति समस्या को देख पाता है, फिल्म में दलितों की समस्या उतनी ही दिखती है। यह फिल्म दलितों के प्रति पढ़े-लिखे सवर्ण लोगों के मन में एक सहानुभूति पैदा करती है। हॉल में बैठे दर्शकों की प्रतिक्रिया से भी यह स्पष्ट हुआ। यह सहानुभूति भी सकारात्मक है।

लेकिन ऐसी फिल्में आती हैं तो मेरे मन में यह सवाल उठता है कि जाति समर्थक साम्राज्यवादी व्यवस्था में ऐसी फिल्म को निर्माता कैसे मिला? और इस फिल्म का निर्माता तो “ज़ी समूह” है। फिर इस फासीवादी सत्ता के सेंसर से बचकर फिल्म कैसे सिनेमा हाल तक आ गई। (फिल्म ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का शुक्रिया भी अदा किया है) फिल्म देखने पर ये सारी बात स्पष्ट हो गई। इसलिए मैं फिल्म की कहानी या अच्छाई पर बात नहीं करूंगी, बल्कि इस पहलू पर ही बात करूंगी।

फिल्म के कुछ बिंदुओं से होते हुए मूल बात तक आते हैं-

1-  फिल्म देखकर ऐसा लगता है कि पढ़ा-लिखा तबका और विदेश में पढ़े लोगों के अंदर जातिवाद होता ही नहीं, जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं है। खुद फिल्म में भी वह जातिवाद पर सवाल तो उठाता है लेकिन उसे तोड़ने के लिए कुछ करता नहीं दिखता। उसके घर दलित लोगों को ऊपर से पानी पिलाया गया, जिस पर उसने धीरे से आपत्ति की, लेकिन किया कुछ नहीं। उसने देखा कि मंदिर पर खाने के कारण 3 दलितों को पीटा जा रहा है, लेकिन उसने हल्के से सवाल पूछने के अलावा कुछ नहीं किया। उसके ऑफिस के कंपाउंड में एक सफाईकर्मी बगैर किसी सुरक्षा के सीवर में उतरता है और वो कुछ नहीं करता, जबकि यह सफाई अब मशीन से भी हो सकती है। वह कोई सामान्य आदमी नहीं आईपीएस अधिकारी है, जो यह सब बदल सकता है, फिर भी सभी मुद्दों पर चुप हो जाता है। और भी कई दृश्य फिल्म में हैं। यह इस पढ़े-लिखे तबके का सॉफ्ट जातिवाद है, जिसे जो चीज़े गलत लग भी रही हैं उसे वह रत्ती भर भी बदलना नहीं चाहता। दरअसल यह फिल्म “मानवीय या संवेदनात्मक ब्राह्मणवाद” परोसती है।

2- फिल्म जाति से जुड़े बहुत से मुद्दों को बहुत ही वेग और सतही तरीके से छूती हुई चलती है, किसी भी मुद्दे की गहराई में नहीं जाती है। कुछ बातें तो इतनी वेग तरीके से कहीं गई है कि समझ में ही नहीं आती, जैसे कि दलित नेता निषाद को किसने मारा? हत्यारों को पुलिस के लिबास में दिखाने से निर्देशक क्यों बचना चाह रहा था? जबकि उनकी कारवाई पुलिस वाली ही थी।

3- फिल्म की कहानी जाति से संबंधित भारत के अंदर घटित पिछले कुछ सालों में घटी घटनाओं को अपनी कहानी में शामिल करती चलती है, लेकिन भीमा कोरेगांव की घटना जिसने इस ब्राह्मणवादी सत्ता को हिला दिया, का कहीं नाम भी नहीं लेती, क्योंकि यह घटना व्यवस्था को सीधी टक्कर देती है, और लड़ने के लिए प्रेरित करती है। भीमा कोरेगांव पर यह चुप्पी अनजाने में लगाई गई चुप्पी नहीं है। भीम आर्मी के रूप में खड़े हुए एक और दलित आंदोलन के नेता चंद्रशेखर आजाद की तर्ज पर बनाए गए पात्र निषाद के मुंह से यह भी कहला दिया कि “बीच में कोई हथियार नहीं आना चाहिए इसका बहाना लेकर सत्ता हमारे ऊपर दमन करती है” या  ” हम भी हिंसा नहीं मानते” जबकि फिल्म का सत्ता में शामिल ब्राह्मण पुलिस अधिकारी नायक के मुंह से यह कहलाया गया कि “संरचनागत हिंसा भी हिंसा है, जो दिखती नहीं” । जाहिर है, फिल्म में यह उलटबांसी जानबूझ कर की गई है, ताकि दलितों का आक्रोश हिंसा करने तक कतई न पहुंचने पाए।

4- फिल्म दलितों का आंदोलन खड़ा करने की बजाय सत्ता के स्तंभों से सुधार की, और मानवीय होने की उम्मीद की वकालत करती है। फिल्म में दलित नेता जो कि भूमिगत है, को मार दिए जाने के बाद उसकी प्रेमिका गौरा अपना दुख व्यक्त करने के लिए और किसी के पास न जा कर उस पुलिस वाले के पास जाती है, जो उसके ही समुदाय का है, लेकिन जो दो दिन पहले उसकी रिपोर्ट नहीं लिख रहा था। वह पुलिस वाला भी उसे लिपटकर रोता है। फिर गौरा जो कि खुद एक्टिविस्ट है, खुद कुछ नहीं करके पूरी तरह पुलिस पर ही आश्रित रहती है। उसके समुदाय के बाकी लोग भी निरीह से लगते हैं जबकि अयान रंजन जो कि ब्राह्मण है, सत्ता में उच्च पद पर बैठे “शास्त्री” जी के साथ मिलकर केस सुलझा लेता है और अंत में अभियान में लगे सभी पुलिस कर्मियों को दलित महिला की दुकान से रोटी खिलाकर जाति से मुक्त भी कर देता है। पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट सही बनाने वाली दलित डॉक्टर को साहस और सुरक्षा देने का काम भी यह पुलिस अधिकारी ही करता है। खुद वह यह साहस नहीं कर पाती है।

5- फिल्म वर्तमान सरकार में रिलीज इसलिए हुई क्योंकि बदायूं के बलात्कार की यह घटना सपा सरकार के समय की है, वर्तमान सरकार को उसमें एक महंत के रूप में दिखाया गया है, जिसका इन घटनाओं से कुछ लेना देना नहीं है, वह केवल इस घटना का फायदा उठा रहा है, और फिर चुनाव जीत भी जाता है। यह बात वर्तमान सरकार के उतनी खिलाफ नहीं जाती है। बल्कि इस बात को दिखाते हुए उनकी “सामाजिक समरसता” प्रचार ही हो जाता है। फासीवाद की तो यह विशेषता ही है कि वह अपने विरोध में कहीं जाने वाली बातों पर चुप रह कर सिर्फ अपनी बात बोलते रहते हैं, इतनी बार कि उसे मानने वाला एक तबका तैयार हो जाता है। फिल्म ने यह काम कर दिया है। फिल्म की शुरुआत में आदित्यनाथ को धन्यवाद देना महज औपचारिकता नहीं है।

6- आर्टिकल 15 और बाज़ार – सवाल उठता है कि यह फिल्म बनाई क्यों गई है, जिसमें ज़ी समूह और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का सहयोग है? इसका जवाब फिल्म के शुरू होते ही (और अंत में भी) मिल जाता है, जब नायक ब्राह्मण पुलिस अफसर एक दलित बस्ती स्थित दुकान से मिनरल वॉटर की बोतल खरीदने को कहता है और अधीनस्थ पुलिस कर्मी यह कहकर मना कर देते हैं कि “इनकी छाया भी वर्जित है”। लेकिन नायक जो कि पूंजीवादी संस्कृति में पला बढ़ा है, उसे ये बात अटपटी लगती है और वह वहीं से पानी खरीदने को कहता है और पी भी लेता है। यह “बाज़ार फ्रेंडली लोकतंत्र” है, और यह फिल्म इसके प्रचार के लिए ही बनाई गई है। फिल्म के बीच में भी ‘sarf’ के विज्ञापन की टैग लाइन “दाग अच्छे हैं” को ब्राह्मणवाद  के खिलाफ बोला गया है।  यह सुनने में तो चुटीला लग रहा है, लेकिन साथ भी यह भी संदेश देता है कि ‘बाज़ार ब्राह्मणवाद का विरोधी है’, जो कि सच नहीं है। पूंजीवाद अपनी आर्थिक मंदी से निकलने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी ज़द में लेना चाहता है। वह बाज़ार का विस्तार चाहता है, लेकिन यदि जाति की आंच उसकी दुकानदारी या मुनाफे पर आती है, तो वह उसे उतना बदलने में लग जाती है, जितना उसके लाभ के लिए आवश्यक है। इसके लिए अक्सर उसे लोगों के दिमागी मूल्य बदलने की जरूरत भी होती है। इस समय वह पुराने मूल्यों के बोरे को हिलाकर उसमे जनवादी और क्रांतिकारी मूल्यों के लिए थोड़ी जगह बना देती है। पिछले कई सालों से साम्राज्यवादियों की आर्थिक मंदी के कारण भारत का शोषित तबका जिसकी बड़ी आबादी दलितों की है, आंदोलित हो उठा है, जिसके कारण सत्ता व्यवस्था अस्थिर हो गई है यह बाज़ार की व्यवस्था के खिलाफ जाता है, क्योंकि इससे क्रांतियां जन्म लेती है। क्रांति संपन्न नहीं भी हो सकी तो मजदूर किसान के रूप में दलित अपने हक अधिकार की बात करते है, जिससे उनके मुनाफे पर संकट बढ़ जाता है। अतः उन्हें शांत करने के लिए वह यह तरीका निकलता है। उनकी मिनरल की बोतल और दूसरे उत्पाद सुवर पालने वाली बस्ती तक से बिक सके और सभी उसे खरीद सकें, इसके लिए लोगों के मूल्यों में बदलाव जरूरी है, फिल्म के माध्यम से इसी बदलाव की कोशिश की गई है। यह पहली बार नहीं हुआ है। इसके पहले जब महिलाओं के आंदोलन तेज होने लगे थे तो “पिंक” फिल्म के माध्यम से महिलाओं की आज़ादी की बात करते हुए उन्हें साम्राज्यवादी बाज़ार तक पहुंचने की कोशिश की गई थी, उसके भी पहले नौजवानों को आंदोलन का रास्ता छोड़ सत्ता में शामिल होने के लिए “रंग से बसंती” बनाई गई थी। यह भी अनायास नहीं है कि “कबीर सिंह” जैसी पिछड़े मूल्य वाली और “आर्टिकल 15” जैसी फिल्में एक साथ निर्माताओं द्वारा परोसी जा रही है। क्योंकि हमारा समाज “अर्द्ध सामंती अर्द्ध औपनिवेशिक” है। यहां दोनों मूल्यों का बाज़ार मौजूद है, जब जैसी जरूरत होती है निर्माता वैसी फिल्में हमारे सामने पेश कर देते हैं। मूल्यों में दोनों तरह की फिल्में एक दूसरे की विरोधी दिखते हुए भी बाज़ार के लिहाज से एक दूसरे की पूरक हैं। सत्ता मूल्यों में ऐसे सामंजस्य बिठाए जाने का महत्व जानती है, इसलिए ये फिल्में सेंसर बोर्ड से पास हो जाती हैं इन्हें निर्माता भी मिल जाते है। जो पिछड़ी कट्टर सोच वाले लोग ‘बाज़ार और सत्ता’ के इस गणित को नहीं समझ पाते, वे इन फिल्मों का विरोध करते हैं, और फिर जातिवादी सत्ता इसका भी इस्तेमाल अपने पक्ष में कर लेती है। 
समस्या हम जैसे लोगों के सामने आती है कि “आर्टिकल 15” और “पिंक” जैसी फिल्मों को क्या मानें – अच्छी या बुरी, प्रगतिशील या पिछड़ी? 
हम “आर्टिकल 15” के कथा लेखक गौरव सिंह सोलंकी और निर्देशक अनुभव सिन्हा को धन्यवाद कहते है कि उन्होंने बाज़ार के लिए सामंती व्यवस्था का बोरा हिलाया और दलितों के लिए भी थोड़ी स्पेस बनाने का काम किया, लेकिन वास्तव में तो यह स्पेस दलितों के लिए नहीं बाज़ार के लिए बनाया गया है, इसलिए इस स्पेस का लाभ लेकर हम यही तक नहीं रुकेंगे। इस लड़ाई में हम अपना रास्ता अलग लेंगे, अपना नायक अपने बीच से ही बनाएंगे, अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे, और सबसे महत्वपूर्ण कि उस इतिहास के साथ लड़ेंगे, जिसके ऊपर फिल्म बनाने के बारे में ये मुनाफाखोर फिल्म इंडस्ट्री कभी नहीं सोच सकती। 
सीमा आज़ाद

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